रायपुर, टीम पत्रवार्ता,31 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार किसी चमत्कार से नहीं बनी। यह सत्ता उन लाखों कार्यकर्ताओं के खून-पसीने से बनी, जिन्होंने वर्षों तक कांग्रेस से सड़क, बूथ और गांव-गली में लड़ाई लड़ी। चुनावी मौसम में वही कार्यकर्ता थे जो झंडा उठाए खड़े थे, नारे लगा रहे थे, गालियां खा रहे थे और सत्ता परिवर्तन का सपना जनता तक पहुंचा रहे थे।
लेकिन सत्ता आने के बाद तस्वीर तेजी से बदली। मुख्यमंत्री बने विष्णुदेव साय, उपमुख्यमंत्री बने, मंत्री बने और इसके बाद संगठन और सरकार के गलियारों में एक अजीब-सी खामोशी छा गई। ऐसा लगा मानो सत्ता का दरवाज़ा बंद हो गया हो और बाहर वही कार्यकर्ता खड़ा रह गया हो, जिसने दरवाज़ा खुलवाने में पूरी उम्र लगा दी।
डेढ़ साल बाद कुछ दर्जन नाम, और फिर सन्नाटा
करीब डेढ़ साल की लंबी प्रतीक्षा के बाद संगठन ने मंडल, आयोग, प्राधिकरण और बोर्डों की सूची सरकार को सौंपी। तब जाकर कुछ दर्जन नेताओं को सत्ता में औपचारिक हिस्सेदारी मिली। प्रदेश स्तर की लगभग 95 प्रतिशत नियुक्तियां पूरी कर ली गईं लेकिन यह उपलब्धि सिर्फ “ऊपर” तक सीमित रही यानी सिर्फ अध्यक्ष बनाए गए सदस्यों का कॉलम छोड़ दिया गया। वहीं दूसरी तरफ जिला, तहसील और मंडल स्तर पर वही कार्यकर्ता, जो चुनाव में भाजपा का चेहरा थे, आज भी सिर्फ दर्शक बने हुए हैं। दर्जनों आयोग और बोर्ड बने, लेकिन उनमें सदस्यों की नियुक्ति जैसे छोटे-से काम के लिए भी संगठन के पास समय नहीं है।
क्या सामान्य कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर लगाने के लिए है?
30–40 साल भाजपा को देने वाला कार्यकर्ता कोई मंत्री नहीं बनना चाहता। वह सिर्फ इतना चाहता है कि उसे यह महसूस हो कि सत्ता उसकी भी है। एक बोर्ड सदस्य का पद, एक आधिकारिक लेटर पैड, एक विज़िटिंग कार्ड बस इतना-सा सम्मान। वह समाज में सीना चौड़ा करके कह सके कि “मैं भी सरकार का हिस्सा हूं।”लेकिन संगठन के आका शायद यह भूल चुके हैं कि सत्ता केवल कुर्सियों से नहीं चलती, बल्कि सम्मान से चलती है।
सरकार कहती है संगठन तय करेगा?
मंत्री साफ कहते हैं “सूची संगठन से आएगी तो नियुक्ति होगी।”मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी साफ शब्दों में कह चुके हैं “संगठन जैसा तय करेगा, सरकार वैसा करेगी। तो फिर सवाल सीधा है संगठन कर क्या रहा है?
दो साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन मंडल, जिला और तहसील स्तर पर नियुक्तियों को लेकर कोई ठोस पहल नहीं दिखती। निगाहें टिकती हैं संगठन के सबसे ताकतवर चेहरों पर संगठन महामंत्री पवन साय और क्षेत्रीय संगठन मंत्री अजय जमवाल पर। समझ नहीं आता आखिर क्यों सामान्य कार्यकर्ता को सत्ता में भागीदार बनाने में वे इतनी बेरुखी दिखा रहे है?
मौका नहीं मिलेगा तो काम कैसे दिखेगा?
यह सिर्फ भावनात्मक सवाल नहीं है, यह प्रशासनिक सवाल भी है। जब सरकार के विभिन्न अंगों में पर्याप्त लोग नहीं होंगे, जब समितियां और बोर्ड अधूरे रहेंगे, तो जनसुविधा कैसे सुधरेगी? परिणाम कैसे आएंगे? जवाबदेही कैसे तय होगी?
सत्ता में भागीदारी केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि काम करके साबित करने का अवसर भी होता है। और अगर अवसर ही नहीं मिलेगा, तो यह शिकायत भी जायज़ है कि “हमें साबित करने का मौका नहीं दिया गया।”
यह पहलू भी कार्यकर्ताओं के लिए असहनीय
कार्यकर्ताओं की दृष्टि से इस पूरे परिदृश्य का सबसे कड़वा और असहनीय पहलू यह भी है कि जो लोग चंद वर्षों पहले भाजपा में आए, जिनका संघर्ष और त्याग पार्टी के कठिन दौर में कहीं दर्ज ही नहीं है, वही आज सत्ता के सबसे बड़े हिस्सेदार बने बैठे हैं और ऊंचे-ऊंचे पदों पर विराजमान हैं। दूसरी ओर, जिन कार्यकर्ताओं ने 30–40 साल संगठन को दिए, जिनकी मेहनत से भाजपा सत्ता तक पहुंची, वे आज भी नियुक्ति की आस में दर-दर देख रहे हैं। इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सत्ता में बैठे ये नए चेहरे उन्हीं पुराने कार्यकर्ताओं को नियम, कानून, अनुशासन और पार्टी सिद्धांतों का पाठ पढ़ा रहे हैं।
यह स्थिति केवल संगठनात्मक अन्याय नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है। अगर भाजपा में यह संदेश गया कि वर्षों की निष्ठा और संघर्ष से ज्यादा अहमियत हालिया एंट्री और सत्ता-समीकरण की है, तो यह संगठन की जड़ों को कमजोर करने वाला संकेत होगा, जिसकी कीमत भविष्य में पार्टी को चुकानी पड़ सकती है।
आज सवाल यह नहीं है कि किसे पद मिलेगा, सवाल यह है कि क्या भाजपा अपने उस कार्यकर्ता को यह भरोसा दिला पाएगी कि सत्ता सिर्फ चंद चेहरों की नहीं, बल्कि समर्पण करने वाले हर व्यक्ति की है। अगर यह भरोसा समय रहते नहीं दिया गया, तो असंतोष बढ़ेगा जिसका नुकसान सत्ता और संगठन दोनों को होगा।



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