रायपुर, टीम पत्रवार्ता,17 जनवरी 2026
छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों एक अजीब मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। राज्य में जहां भी कोई गड़बड़ी, लापरवाही या प्रशासनिक चूक सामने आती है, उसका सीधा ठीकरा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सिर फोड़ दिया जाता है। वहीं, जिन विभागों में वास्तविक गड़बड़ियां होती हैं, उनके मंत्री और जिम्मेदार अफसर लगभग बेदाग़ बच निकलते हैं।
यह सवाल अब आम जनता भी पूछने लगी है कि क्या मुख्यमंत्री अकेले हर जिले, हर गोदाम, हर कार्यालय और हर विभाग की दिन-रात निगरानी कर सकते हैं? कवर्धा और महासमुंद में धान खरीदी के दौरान चूहों द्वारा अनाज नष्ट होने जैसी गंभीर घटनाएं यदि सामने आती हैं, तो पहला सवाल विभागीय मंत्री से होना चाहिए, जिला प्रशासन से जवाबदेही तय होनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यहां गलती नीचे होती है और निशाना ऊपर लगाया जाता है। यह शासन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से बचने की सबसे आसान राजनीतिक चाल बन चुकी है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को निशाने पर लेने वालों को यह समझना चाहिए कि वे एक ऐसे नेता पर आरोप लगा रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा “अपराध” उसकी सादगी और संयम है। आज के शोर-शराबे वाले राजनीतिक दौर में, जहां बयानबाज़ी और आक्रामकता को ही नेतृत्व का पैमाना मान लिया गया है, वहां विष्णुदेव साय शांति और काम की राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री हैं। वे न कैमरों के लिए गरजते हैं, न अनावश्यक बयान देते हैं। वे प्रचार से नहीं, परिणाम से पहचान बनाते हैं। यही सादगी आज कुछ लोगों को खटकती है, क्योंकि शोर के बाजार में एक शांत नेता सबसे बड़ा खतरा बन जाता है।
सच्चाई यह भी है कि मुख्यमंत्री को कई बार मंत्रिमंडल और तंत्र से वैसा सहयोग नहीं मिल पाता, जैसा एक मजबूत सरकार में अपेक्षित होता है। कुछ विभागों में ढिलाई है, कहीं अफसरशाही हावी है और कहीं लापरवाही को नजरअंदाज किया जा रहा है। जब हालात बिगड़ते हैं, तो सबसे आसान रास्ता यही चुना जाता है कि मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। सवाल यह है कि फिर विभागीय मंत्री किस लिए हैं? क्या केवल पद, बंगला और फोटो खिंचवाने के लिए? यदि किसी विभाग में लगातार शिकायतें आ रही हैं, तो मंत्री की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने विभाग को दुरुस्त करे और परिणाम दे।
इस पूरे परिदृश्य में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का धैर्य सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने न केवल प्रशासनिक दबाव झेला है, बल्कि संगठन के भीतर समानांतर सत्ता चलाने की कोशिशों को भी संयम के साथ सहा है। इसके बावजूद उन्होंने कभी सार्वजनिक मंच पर शिकायत नहीं की, कभी भीतर की बात बाहर नहीं आने दी और न ही किसी पर आरोप-प्रत्यारोप किया। यही उनकी राजनीतिक परिपक्वता और मर्यादा है।
मुख्यमंत्री के खिलाफ षड्यंत्र कोई नई बात नहीं है। कभी अफवाहों के जरिए, कभी प्रशासनिक विफलताओं का दोष उन पर मढ़कर, तो कभी मंत्रियों और अफसरों की लापरवाही को “मुख्यमंत्री की नाकामी” बताकर। फर्जी वीडियो प्रकरण ने यह भी दिखा दिया कि साजिशें किस हद तक जा सकती हैं। बावजूद इसके, विष्णुदेव साय विचलित नहीं हुए। उन्होंने बदले की राजनीति नहीं की, बल्कि कानून को अपना काम करने दिया।
विष्णुदेव साय एक जमीन से जुड़े, सीधे-साधे आदिवासी नेता हैं। उनकी पहचान बनावटी नहीं है, उनकी राजनीति दिखावे की नहीं है। वे चमक-दमक और आक्रामकता के नहीं, बल्कि सहजता और संतुलन के प्रतीक हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज की राजनीति में सिधाई को कमजोरी समझ लिया जाता है।
यह भी सच है कि प्रदेश में जो सकारात्मक फैसले और दूरगामी योजनाएं बनी हैं, उनकी दिशा स्वयं मुख्यमंत्री ने तय की है। विज़न मुख्यमंत्री का है, प्राथमिकताएं मुख्यमंत्री की हैं। लेकिन जब सिस्टम में बैठे कुछ लोग अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं, तो अच्छे कामों की चमक भी फीकी पड़ने लगती है और श्रेय-अपश्रेय की राजनीति शुरू हो जाती है।
छत्तीसगढ़ आज कई चुनौतियों से जूझ रहा है—नक्सल प्रभावित क्षेत्र, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, अफसरशाही की जड़ता और राजनीतिक दबाव। इन सबके बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय धैर्य के साथ सरकार चला रहे हैं। यही उनकी असली ताकत है और यही उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान।
आज प्रदेश को ऐसे मुख्यमंत्री की आवश्यकता है जो प्रदर्शन नहीं, परिणाम दे; जो गुस्से से नहीं, संयम से काम करे; और जो बदले की नहीं, विकास की राजनीति करे। विष्णुदेव साय उसी श्रेणी के नेता हैं। लेकिन यदि सिस्टम के भीतर बैठे लोग अपनी जवाबदेही निभाने की बजाय मुख्यमंत्री की छवि को ढाल बनाते रहेंगे, तो नुकसान किसी व्यक्ति का नहीं, पूरे प्रदेश का होगा।
क्योंकि मुख्यमंत्री कमजोर नहीं हो रहे—उन्हें कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। और अब जनता यह फर्क समझने लगी है।



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