योगेश थवाईत,संपादक,टीम पत्रवार्ता
लोकतंत्र बड़ा दिलचस्प है। यहां कभी शब्दों की तलवारें खिंच जाती हैं, तो कभी वही हाथ सम्मान की माला भी पहना देते हैं।
कुछ दिन पहले जशपुर जिले के जनपद पंचायत बगीचा की बैठक में जो दृश्य सामने आया था, वह किसी से छिपा नहीं था।
आरोप-प्रत्यारोप, तीखी बहस और फिर एक-दूसरे को "देख लेने" की चेतावनी। एक ओर "कालिख पोतकर वापस भेजने" जैसी तल्ख टिप्पणी, तो दूसरी ओर "देख लेंगे" का जवाब।
वीडियो वायरल हुआ, चर्चाएं हुईं और लोगों ने अपने-अपने पक्ष चुन लिए।समय बीता... मामला शांत हो गया।
आज वही जनपद कार्यालय था, वही लोग थे, लेकिन तस्वीर बिल्कुल अलग थी। फूलों की मालाएं थीं, केक था, तालियां थीं और सेवानिवृत्त हो रहे सीईओ के कार्यकाल की प्रशंसा के साथ भावभीनी विदाई भी।
अब लोग उस पुराने वायरल वीडियो को फिर याद कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उस दिन कैमरे में गुस्सा कैद हुआ था, और आज सम्मान।
शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती भी है और सबसे बड़ी विडंबना भी "जहां मतभेद स्थायी हो सकते हैं, लेकिन रिश्ते हमेशा वैमनस्य के नहीं होते।सार्वजनिक जीवन में तकरार भी होती है और समय आने पर गरिमा के साथ सम्मान भी।"
हो सकता है उस दिन की कड़वाहट पूरी तरह कभी खत्म न हुई हो, और मन की टीस कहीं न कहीं रह गई हो। लेकिन यह भी सच है कि विदाई के अवसर पर व्यक्तिगत कटुता से ऊपर उठकर सम्मान देना लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत माना जाता है।
आखिरकार, राजनीति और प्रशासन में "कालिख" से ज्यादा देर तक "माला" ही याद रहती है। और शायद यही संदेश इस पूरे घटनाक्रम से भी निकलकर सामने आता है।
खैर!राजनीतिक मसला जो भी हो एक जिम्मेदार व्यक्तित्व के साथ दबंगई से काम करने वाले अधिकारी रिटायर्ड सीईओ विनोद सिंह अपनी कार्यशैली को लेकर हमेशा याद किए जाएंगे।पत्रवार्ता परिवार की ओर से आपको उज्जवल भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएं बधाई....
खास बात यह है कि सीईओ साहब को फिर से नई जिम्मेदारी मिलने के संकेत हैं जो सेवा के क्षेत्र में योगदान देते हुए पुनः हम सबके बीच होंगे....


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