जशपुर, टीम पत्रवार्ता,24 जून 2026
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह दिन है, जिसे देश कभी भुला नहीं सकता। उस रात देश में आपातकाल लागू किया गया और इसके साथ ही संविधान की मूल भावना, नागरिक स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर प्रहार हुआ। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और असहमति की आवाज़ को दबाने का प्रयास किया गया।
आज की युवा पीढ़ी ने उस दौर को नहीं देखा है, इसलिए उनके लिए यह जानना आवश्यक है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए हजारों लोगों ने अपने अधिकारों, सम्मान और स्वतंत्रता की कुर्बानी दी थी। देशभर में लाखों राजनीतिक कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, विद्यार्थी और विपक्षी नेता मीसा (MISA) तथा डीआईआर (DIR) जैसे कठोर कानूनों के तहत बिना किसी अपराध के जेलों में बंद कर दिए गए थे। उनका एकमात्र अपराध लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए आवाज़ उठाना था।
मेरे लिए आपातकाल केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि परिवार के संघर्ष और त्याग का हिस्सा है। मेरे पूज्य पिताजी स्वर्गीय जगदीश राय उन मीसा बंदियों में शामिल थे जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जेल की यातनाएँ सहीं। उस समय परिवार को आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों और राष्ट्रहित से कभी समझौता नहीं किया। उनका संघर्ष आज भी मुझे लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने की प्रेरणा देता है।
देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे असंख्य लोकतंत्र सेनानी थे जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के तानाशाही का विरोध किया। अनेक परिवारों ने कठिनाइयाँ झेलीं, रोजगार प्रभावित हुए, बच्चों की शिक्षा बाधित हुई, लेकिन लोकतंत्र के प्रति उनका विश्वास अडिग रहा। आज जब हम स्वतंत्र वातावरण में अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं, तब उन लोकतंत्र सेनानियों और मीसा बंदियों का स्मरण करना हमारा नैतिक दायित्व है।
आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के सम्मान से मजबूत होता है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है।
आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी आपातकाल के इतिहास को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा की सबसे बड़ी सीख के रूप में समझे। यदि नागरिक सजग नहीं रहेंगे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के महत्व को नहीं समझेंगे, तो इतिहास स्वयं को दोहराने का प्रयास कर सकता है। इसलिए आपातकाल की बरसी केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का दिन भी है।
आज भारत लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और जनभागीदारी को मजबूत करने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले प्रत्येक मीसा बंदी, प्रत्येक लोकतंत्र सेनानी और उनके परिवारों को नमन करना आवश्यक है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी।
मैं विशेष रूप से युवाओं से कहना चाहता हूँ कि स्वतंत्रता केवल विरासत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की पुस्तकों से नहीं होती, बल्कि जागरूक और जिम्मेदार नागरिकों से होती है। इसलिए आपातकाल के इतिहास को जानिए, लोकतंत्र सेनानियों के त्याग को समझिए और यह संकल्प लीजिए कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना पर भविष्य में कभी भी तानाशाही की छाया नहीं पड़ने देंगे।
लोकतंत्र हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुआ है। इसके पीछे अनगिनत लोकतंत्र सेनानियों का संघर्ष, मीसा बंदियों की यातनाएँ और लाखों देशभक्तों का अदम्य साहस निहित है। यही इतिहास आज की पीढ़ी को जानना, समझना और याद रखना चाहिए।


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