रायपुर, टीम पत्रवार्ता,5 जुलाई 2026
विश्वविख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण तीजन बाई पंचतत्व में विलीन हो गईं, लेकिन उनके जाने के बाद उनके शिष्यों के मन में जो खालीपन है, उसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। उनकी शिष्या तरुणा साहू ने सोशल मीडिया पर एक अत्यंत भावुक संस्मरण साझा किया है, जो गुरु-शिष्य परंपरा, स्नेह और संस्कार का जीवंत दस्तावेज बन गया है।
तरुणा साहू लिखती हैं कि धमतरी जिले के छोटे से गांव गिधावा की एक साधारण बच्ची होने के नाते उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उनका जीवन पंडवानी की विश्वविख्यात साधिका तीजन बाई से जुड़ जाएगा। जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा छठवीं के दौरान आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर में करीब 200 बच्चों के बीच से तीजन बाई ने उन्हें अपनी शिष्या के रूप में चुना। यही पल उनके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य बन गया।
उनके अनुसार, गुरु माँ ने उन्हें केवल पंडवानी की कला ही नहीं सिखाई, बल्कि अनुशासन, समर्पण, मेहनत, विनम्रता और जीवन जीने की सीख भी दी। समय के साथ उनका रिश्ता गुरु-शिष्या से आगे बढ़कर माँ-बेटी जैसा हो गया। जब भी वे गुरु माँ के घर जातीं, तीजन बाई अपने हाथों से खाना खिलातीं, बाल संवारतीं, मेकअप करतीं और अपने पास सुलातीं।
संस्मरण में बचपन की एक मासूम याद भी है। तरुणा बताती हैं कि गुरु माँ को पान खाना बहुत पसंद था। उन्हें लगता था कि शायद पान खाए बिना पंडवानी नहीं गाई जा सकती, इसलिए वे प्रस्तुति से पहले गुरु माँ से पान मांगती थीं। गुरु माँ मुस्कुराकर उन्हें पान देतीं और फिर वे पूरे उत्साह से पंडवानी गाती थीं। आज वही छोटी-सी याद उनकी सबसे बड़ी धरोहर बन गई है।
गुरु माँ के साथ उन्हें दिल्ली, भोपाल, उज्जैन के कालिदास समारोह, रायपुर सहित देश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति देने का अवसर मिला। कई बार तीजन बाई एक प्रसंग का आधा भाग स्वयं गातीं और शेष भाग अपनी शिष्या को सौंप देतीं। यह विश्वास और स्नेह तरुणा के लिए जीवन का सबसे बड़ा सम्मान रहा।
बाद में तरुणा साहू ने रेलवे सुरक्षा बल (RPF) में निरीक्षक के रूप में सेवा का दायित्व संभाला, लेकिन उन्होंने पंडवानी और लोकसंस्कृति से अपना रिश्ता कभी नहीं तोड़ा। उनका कहना है कि वर्दी पहनकर देश की सेवा करना और मंच पर अपनी संस्कृति की सेवा करना—दोनों ही उन्हें गुरु माँ की प्रेरणा से मिले।
गुरु माँ की अंतिम विदाई के बाद भावुक शब्दों में उन्होंने लिखा कि आज ऐसा लगता है जैसे जीवन का एक मजबूत स्तंभ टूट गया हो। लेकिन उनकी आवाज, उनकी सीख, उनके संस्कार और उनकी पंडवानी हमेशा जीवित रहेंगे। जब भी वे मंच पर पंडवानी प्रस्तुत करेंगी, उन्हें महसूस होगा कि गुरु माँ सामने बैठकर मुस्कुरा रही हैं और उन्हें आशीर्वाद दे रही हैं।
अपने संस्मरण का समापन तरुणा साहू इन शब्दों के साथ करती हैं—
"मैं जीवन भर गर्व से कहती रहूँगी— मैं पद्म विभूषण तीजन बाई जी की शिष्या हूँ। यही मेरी सबसे बड़ी पहचान है, यही मेरा सबसे बड़ा सम्मान है।"
यह संस्मरण केवल एक शिष्या की श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस गुरु-शिष्य परंपरा का भावनात्मक दस्तावेज है, जिसने छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में पहचान दिलाई।
साभार : तरुणा साहू की सार्वजनिक फेसबुक पोस्ट पर आधारित संस्मरण


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