Recents in Beach


विशेष :- देश की ज्वलंत समस्या..? लोहा कौन बनाएगा..?..अडानी,अगरिया या असुर ?


 रामप्रकाश पाण्डेय,जशपुर की कलम से..
(लेखक पर्यावरण संरक्षण व जनजातीय उत्थान की दिशा में कार्य कर रहे हैं।)

जशपुर,छत्तीसगढ़ (पत्रवार्ता) आज देश के सामने ज्वलंत प्रश्न है की लोहा कौन बनाएगा......अडानी ..? अगरिया ? असुर ?

तब जशपुर के ग्राम हर्रा डीपा में इस परम्परागत कार्य को करने वाले अगरिया जाति के शिक्षित युवक जो स्वयं वर्तमान में अडानी पावर कम्पनी में मेकेनिकल इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं उसने इस ज्वलंत प्रश्न का उत्तर दिया।

दरअसल अडानी और अन्य कम्पनियों के द्वारा वर्षो से बन्द किए गए परंपरागत चिमनी की धौकनी को धौंक कर वे इसका जबाब दे रहै हैं।

इसे समझने के लिए आपको थोड़ा गौरवशाली इतिहास का अध्यन करना होगा जी हां गौरवशाली इसलिए क्योंकि उस समय अडानी व जिंदल जैसी बड़ी कंपनियां नहीं थी इसके बावजूद रामायण,महाभारत काल के समस्त लौह हथियार इसी अगरिया व असुर जनजाति के लोगों ने बनाया जो जशपुर के सुदूर वनांचल में अपनी पुरानी धौंकनी को जीवंत रखते हुए उक्त प्रश्न का करारा जवाब दे रहे हैं।

सभी को मालूम है की देश में औद्योगिक करण से पूर्व भी लोह अयस्क का उपयोग होता रहा है और  यह कार्य परिस्थिक तन्त्र के रूप में होता था ! जैसे नदियों पहाड़ो से पत्थरों और बालू को चुनकर उनसे लोह अयस्क निकालने का कार्य असुर एवम् अगरिया जाति के लोग करते थे ,और उसके  पश्चात उस लोह अयस्क को विभिन्न रूप में ढालने का कार्य लोहार करते थे और उनका उपयोग गांव के विभिन्न जाति के किसान करते थे।

लेकिन कालांतर में इस तन्त्र को ध्वस्त करने का कार्य अवैज्ञानिक रूप से हुए औद्योगिक करण ने किया,प्रकृति हमें अपनी आवश्यकता के लिए जितना स्वेच्छा से देती थी उसे स्वीकार न कर हमने अनावश्यक रूप से धरती का सीना चीरकर और जंगलो की बली देकर धरती के गर्भ में पल रहे खनिज को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह निकालने का प्रयास होने लगा जिसका परिणाम हम सब के सामने है।

आज बस्तर के बैलाडीला में लोहे के खदान को रोकने के लिए ग्रामीण सड़को पर भूखे प्यासे लेटे है तब सरकार के सामने यह यक्ष प्रश्न फिर से खड़ा है की आखिर इन लोह अयस्कों व जंगलो पर पहला अधिकार किसका है ?

और क्यों..? सरकार ग्रामीणों को राय में लिए बगैर चोर दरवाजे से किसी कम्पनी को लोह अयस्क निकालने का आदेश दे रही है ?

जशपुर के हर्रा डीपा की सैकड़ो वर्षो से बुझी चिमनी की धौकनी को पैरों से धौंकने वाले युवक की धौकनी से जो आवाज निकाल रही है कभी महर्षि पतंजलि ने गांव में इस आवाज को सुना था और उन्होंने मनुष्य को स्वस्थ रखने के लिए इज़ाद किए गए प्राणायाम में से एक भस्त्रिका प्राणायाम की रचना की थी ।

आज शुद्धता और अशुद्धता पर भी चर्चा चल रही है तब भी एक तरफ अडानी का लोहा और दूसरी तरफ हर्रा डीपा में तैयार हुए लोहा में इसी लोहे को शुद्ध भी माना गया है ।

इसी लोहे के औषधीय गुण के कारण आयुर्वेद ने भी रक्त की कमी आदि को दूर करने इस लोहे का लौह भस्म,मण्डूर भस्म के रूप में औषधीय उपयोग भी किया था जो अडानी के अशुद्ध लोहे से सम्भव नही है।

अगरिया जाति के अमसाय राम मात्र इस चिमनी की आग प्रज्वलित करने के लिए यह धौकनी नही धौंक रहे बल्कि सरकारों की आँखों में बंधी पट्टी को खोलने के लिए भी यह कार्य कर रहे हैं।

एक समय जब नमक पर भी अंग्रेजो ने अपना अधिकार जमा लिया था तब गांधी जी ने नमक कानून को तोड़ने खुद नमक बनाया था उसी तरह सिर्फ अडानी अम्बानी का विरोध करने से कुछ नही होगा ग्रामीणों को अपनी प्राचीन पद्धति से जंगलो में बिखरे लोह अयस्क को गलाकर स्वयं लोहा बनाना होगा।

हर गांव में इस धौकनी की आवाज गूंजे हर गांव में चिमनी जले तब ही विभिन्न समस्याओ का समाधान होगा,इससे हमारे उपयोग का समान गांव में ही उपलब्ध होगा और जल जँगल और जमीन की रक्षा भी होगी,और तब किसी सरकार को चोर दरवाजे से 25400 पेड़ काटने की अनुमति भी नहीं देनी पड़ेगी......

क्या आप तैयार है इस #लोहसत्याग्रह के लिए..?

कबीर दास जी ने भी इस चमड़े की धौकनी से सजग रहने के लिए कहा है जब इस मरे हुए चमड़े की धौकनी से लोहा भस्म हो जाता है तो सरकारों की क्या अवकात है..?

Post a Comment

0 Comments