रायपुर, टीम पत्रवार्ता, 5 अक्टूबर 2026।
नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ में बदलाव की एक नई तस्वीर सामने आई है। नारायणपुर जिले के भाटपाल में करीब 15 वर्षों तक सुरक्षा बलों के कैंप के रूप में इस्तेमाल हुए परिसर को अब जनजातीय विद्यार्थियों के छात्रावास के रूप में विकसित किया गया है। कभी सुरक्षा और शांति का केंद्र रहा यह परिसर अब दूरस्थ गांवों के बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य निर्माण का आधार बन रहा है।
बस्तर संभाग में अपनी तरह की इस पहली पहल के तहत जिला प्रशासन ने अनुपयोगी हो चुके सुरक्षा कैंप को शिक्षा से जोड़ते हुए यहां प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास शुरू किए हैं। 11 अगस्त 2026 से विद्यार्थियों के लिए आवासीय सुविधा शुरू हो चुकी है।
कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों को आवासीय सुविधा
भाटपाल के पूर्व सुरक्षा कैंप परिसर में संचालित प्री-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास में कक्षा 6वीं से 10वीं तक के विद्यार्थियों के लिए 100 सीटें स्वीकृत हैं। वर्तमान में यहां 114 विद्यार्थी रहकर अध्ययन कर रहे हैं।
इसी परिसर में पोस्ट-मैट्रिक अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास भी संचालित है। इसमें कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों के लिए 50 सीटें स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान में 39 विद्यार्थी निवासरत हैं। यह व्यवस्था एजुकेशन सिटी कुतुल से संबद्ध विद्यार्थियों की आवासीय जरूरत भी पूरी कर रही है।
स्कूल महज 50 मीटर दूर
दूरस्थ और दुर्गम गांवों से आने वाले विद्यार्थियों के सामने पढ़ाई के साथ आवास और परिवहन की समस्या भी बड़ी चुनौती रही है। भाटपाल में छात्रावास की सुविधा ने इस समस्या को काफी हद तक कम किया है।
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भाटपाल छात्रावास से महज 50 मीटर की दूरी पर स्थित है। इससे विद्यार्थियों को रोज लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती और उन्हें पढ़ाई के लिए अधिक समय मिल रहा है। प्री-मैट्रिक से पोस्ट-मैट्रिक स्तर तक आवासीय सुविधा मिलने से विद्यार्थियों की शिक्षा को निरंतर बनाए रखने में भी मदद मिल रही है।
बच्चों ने बताया, अब पढ़ाई करना हुआ आसान
हलामीमुंजमेटा से आने वाले कक्षा 9वीं के विद्यार्थी रितेश सोनी ने बताया कि छात्रावास में रहने से पढ़ाई सुविधाजनक हुई है। स्कूल पास होने और सुरक्षित वातावरण मिलने से विद्यार्थी खुश हैं।
वहीं राजबेड़ा निवासी कक्षा 12वीं के विद्यार्थी कोमेंद्र करीब 22 किलोमीटर दूर से आते हैं। छात्रावास शुरू होने से पहले उन्हें स्कूल के आसपास अलग से रहने की व्यवस्था करनी पड़ती थी, जिससे परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता था। अब छात्रावास में सुरक्षित और व्यवस्थित आवास मिलने से यह परेशानी दूर हुई है।
कलेक्टर ने किया छात्रावास का निरीक्षण
कलेक्टर नम्रता जैन ने भाटपाल पहुंचकर छात्रावास का औचक निरीक्षण किया। उन्होंने विद्यार्थियों के कमरों, भोजन व्यवस्था, स्वच्छता और अन्य मूलभूत सुविधाओं का जायजा लिया तथा बच्चों से सीधे संवाद कर उनकी आवश्यकताओं और समस्याओं की जानकारी ली।
कलेक्टर ने विद्यार्थियों की जायज मांगों पर आवश्यक व्यवस्था सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया। उन्होंने बच्चों को छात्रावास परिसर और कमरों में स्वच्छता बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।
निरीक्षण के दौरान उन्होंने छात्रावास के किचन में पहुंचकर बच्चों के लिए तैयार किए जा रहे भोजन की गुणवत्ता भी देखी। उन्होंने चावल और सब्जी का जायजा लेते हुए स्वच्छता तथा निर्धारित मीनू के अनुसार नाश्ता और भोजन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
सुरक्षा कैंप से शिक्षा के केंद्र तक
भाटपाल का यह बदलाव अबूझमाड़ की बदलती तस्वीर का प्रतीक बनकर सामने आया है। जिस परिसर में करीब 15 वर्षों तक सुरक्षा बलों की तैनाती रही, वहां अब स्कूल यूनिफॉर्म पहने बच्चे किताबों के साथ अपने भविष्य की तैयारी कर रहे हैं।
यह पहल केवल एक पुराने भवन के उपयोग में बदलाव नहीं है, बल्कि विकास की बदलती प्राथमिकताओं को भी दर्शाती है। सुरक्षा के लिए तैयार की गई अधोसंरचना अब शिक्षा और अवसर उपलब्ध कराने में उपयोग हो रही है।
दूरस्थ आदिवासी अंचलों में सड़क, स्वास्थ्य और अन्य मूलभूत सुविधाओं के साथ शिक्षा की पहुंच बढ़ाना भी विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बन रहा है। भाटपाल में पूर्व सुरक्षा कैंप का छात्रावास में बदलना इसी बदलाव की एक प्रभावी तस्वीर है।
जहां कभी सुरक्षा कैंप था, वहां अब बच्चों का छात्रावास है। सुरक्षा की पहचान रहे इस परिसर में अब विद्यार्थियों की पढ़ाई और उनके भविष्य के सपने नई पहचान बन रहे हैं। भाटपाल का यह सफर बदलते अबूझमाड़ की कहानी को सुरक्षा से शिक्षा और अवसर तक पहुंचने की नई भाषा दे रहा है।


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