... राजनैतिक प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर पिछड़ेपन का दंश झेलता खुड़िया साम्राज्य

राजनैतिक प्रतिस्पर्धा के मद्देनजर पिछड़ेपन का दंश झेलता खुड़िया साम्राज्य

  • योगेश थवाईत


यूँ तो हर कोई किसी खास मकसद के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होता है भले ही उसमें उसका आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक या अन्य कोई स्वार्थ जुड़ा हो।यह बात महज औपचारिकता नहीं बल्कि एतिहासिक कटु सत्य है जिसका उदाहरण रामचरितमानस में भी देखने को मिलता है जिसमें स्पष्ट उल्लेख है ''स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति''अर्थात्‌ स्वार्थ के लिए ही सब प्रीति करते हैं।जशपुर जिले के राजनैतिक परिदृश्य में भी यह प्रीति किसी मृग मरीचिका के भटकावे से कम नहीं जहां निरंतर इस भटकाव का दायरा बढ़ता ही जा रहा है।न केवल जननायक,नेतृत्वकर्ता बल्कि निष्ठावान एवं समर्पित लोग भी  अपने लक्ष्य से भटकते जा रहे हैं।राजनैतिक प्रतिस्पर्धा के इस अंधे दौड़ में पत्रवार्ता का प्रकाश निश्चित ही समग्र विकास की परिकल्पना को साकार करने का पहला प्रयास है।आशा है नए संघर्ष को हवा मिलेगी जिससे एक चिंगारी भविष्य में मशाल बनकर सबका पथ प्रदर्शन करेगी।

            इस लेख का उद्येश्य यहां के राजनैतिक परिदृश्य को उजागर करना कतई नहीं है बल्कि समग्र विकास की परिकल्पना के साथ नए आयाम विकिसत किए जाने की ओर एक छोटा सा प्रयास है।बिना किसी सोच के चलने वाली उस भीड़ को दिशा देने का एक  प्रयास है जो अपने आगाज से स्वतंत्र भविष्य का नया मुकाम तय कर सकती है।जिनकी एक कराह की गूंज दिल्ली के राष्ट्रपति भवन तक पंहुचती है क्या उन्हें स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार नहीं है?चुनावों में अपने घर परिवार की चिंता छोड़ दिन रात एक कर संगठन के लिए काम करने वाले आज महज छोटे छोटे पदों के लिए तरसते नजर आ रहे हैं क्या उनका कोई राजनैतिक भविष्य नहीं?जिनके बलबूते दिग्गजों को प्रदेश व केन्द्र में  नेतृत्व का अवसर मिला क्या वे जिले के नेतृत्व के लायक नहीं?उस पिछड़ेपन को वह अधिकार अब तक क्यों नहीं मिला जिसका आम आदमी हकदार है?

खुडिया साम्राज्य के भावी संवाहक 
जवाब ऐसे ही नहीं मिलता पर ढूंढने से आवाज आती है क्या करें साहब बड़े पदों को सम्हालना कोई हंसी ठट्ठे का खेल नहीं।अब ये अलग बात है कि खेल खेल में बड़ी पदवी मिल गई।यहां के दिग्गजों को यह सोचना निहायत जरूरी है कि हमने कब कहा,क्या कहा,कैसे कहा और क्या किया?कहीं वादाखिलाफी तो नहीं की,किसी का दिल तो नहीं दुखाया,अपने कर्तव्य से विमुख तो नहीं हुए,किसी के साथ विश्वासघात तो नहीं किया।खैर छोड़िये साहब ये सारी तो आप आम बातें कर रहे हैं।हर किसी के मुंह से चौक चौराहों में इन बातों को लेकर आरोप प्रत्यारोप की गूंज सुनने को मिल ही जाया करती है।कुछ नया हो तो सुनाइये।वाकई अब तो जानकारी तुरंत मिल जाती है व्हाट्सएप का जमाना है।साहब नहीं देखेंगे कोई बात नहीं निज सहायक समेत चाटुकार नहीं चूकेंगे ये तो दिखाकर ही दम लेंगे,देख ही लीजिए साहब आपके काम की चीज है।फैक्स,ईमेल नहीं अब तो एक फोन ही काफी है देख लेना!जी सर बिलकुल देख ही लेंगे।जिस जमीं को पकड़कर चलना सीखे,जहां पले बढ़े,उस मुकाम पर भी पंहुचे जहां से अब यहां का नजारा धुंधला दिखने लगा।खुद उसे देखने के काबिल नहीं रहे,क्या करें साहब मजबूरी है काम का बोझ अधिक है।कोई बात नहीं देख लेने का आदेश कर दिया है या पांच साल बाद जब आएंगे तो खुद ही देख लेंगे।

आईये हमारे गौरवशाली जशपुर को हम सभी अपनी नजर से देखने का प्रयास करें।केन्द्र हीं नहीं अपितु प्रदेश का नेतृत्व करने वाले दिग्गजों का राजनैतिक सफर इसी जिले के अस्तित्व विहीन गांवों से शुरू हुआ है।प्रदेश की राजनीति के भामाशाहों ने यहीं जन्म लिया जिनके नेतृत्व में न केवल जिले का नाम हुआ बल्कि वह इतिहास के पन्नों में भी अमर हो गया।समूचे जिले में राजपरिवार के साथ दिग्गजों की राजनैतिक दखलंदाजी जिसके बलबूते नए नए कीर्तिमान स्थापित किए जाते रहे हैं।बड़ा सवाल यह उठता है कि गिने चुने राजनेताओं के राजनैतिक प्रगति के अलावा जिले में  सामाजिक,भौगोलिक,आर्थिक,संस्कृति,स्वास्थ्य,शिक्षा समेत अन्य क्षेत्र में प्रगति क्यूं नहीं। यहां के भोले भाले लोगों के बीच छलावा कर राजनीतिक स्वार्थपूर्ति करना ही क्या एकमात्र मकसद रह गया है।यह सवाल उन सभी से जो लंबे समय से इस जिले के कर्ताधर्ता बने बैंठे हैं।उल्लेखनीय है कि जशपुर जिले की नींव अविभाजित मध्यप्रदेश में रखी जा चुकी थी २२ मई१९९८ को स्थापित इस जिले के लगभग सत्रह वर्ष पूर्ण हो चुके हैं।लगभग ५ हजार वर्ग किलोमीटर से भी अधिक क्षेत्र में फैले इस जिले में लगभग तीन विधानसभा क्षेत्र व ८ विकासखण्ड हैं जिनमें आठ लाख से भी अधिक लोग निवासरत हैं।

            ऐसी परस्थिति में जशपुर में शीर्ष नेतृत्व,कुनकुरी में विधायक,पत्थलगांव में संसदीय सचिव अपनी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं।इन सभी में खुड़िया क्षेत्र बगीचा विकास की दौड़ में अछूता रहा है।उल्लेखनीय है कि जशपुर विधानसभा के दिग्गजों की दशा व दिशा का निर्धारण खुड़ियावासी ही करते आ रहे हैं ऐसे में उनकी उपेक्षा कहां तक जायज है।जिले से शीर्ष नेतृत्व व दिग्गजों की टीम होने के बावजूद यहां भूख से मौत कई सवाल खड़े करती है।पिछले २५ वर्षों में न जाने कितने आयोग,कितने प्राधिकरण,कितनी योजनाओं से खुड़ियावासियों का जीवन स्तर सुधारने का प्रयास किया गया भले ही उनका स्तर सुधरा या न सुधरा उनकी आड़ में यहां की राजनीति ने शीर्ष नेतृत्व प्राप्त कर लिया।रही बात विकास की तो और भी कई रास्ते हैं जिस प्रकार बस्तर में कई छोटे जिले बनाकर उनका केन्द्रीकरण किया गया,आईएएस समेत आला अधिकारियों को बैठाया गया निश्चित ही वह सम्पूर्ण विकास तो नहीं पर विकास की ओर बेहतर कदम है।जशपुर की सम्पूर्ण राजनीति खुड़ियावासियों पर निर्भर है इसके बावजूद १०० किलोमीटर का लंबा सफर तय कर उन्हें अपनी समस्याओं के लिए जशपुर जिला मुख्यालय जाना पड़ता है।अविभाजित मध्यप्रदेश में जशपुर से रायगढ़ जिले की दूरी निश्चित ही २०० किलोमीटर से अधिक थी पर जशपुर जिला बनने के बाद यह दूरी सिमट कर रह गई।छत्तीसगढ़ प्रदेश निर्माण के १५ वर्ष बीत जाने के बाद भी खुड़ियावासियों की दूरी कम क्यूं नहीं हुई यह उन दिग्गजों के लिए बड़ा सवाल है जिन्होंने खुड़िया की धरती से उंची उड़ान भरी।

सवाल उनका नहीं जो आपके परिवार के हैं जिन्हें आप अपनी सेना मानते हैं सवाल उन सभी का जिन्होंने आंख बंद कर आप सभी पर भरोसा किया।एक आम आदमी इसी विश्वास के साथ हर अच्छा बुरा काम करने को तत्पर रहता है क्योंकि वह किसी संगठन के लिए प्राण पण से समर्पित है।इन सबके बीच एक आशा की टिमटिमाती किरण उसे इस बात के लिए हमेशा आश्वस्त करती रहती है कि उसका भी सुखद व सुंदर भविष्य होगा उसके क्षेत्र का विकास होगा,उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी,सुखद स्वास्थ्य की पूर्ति होगी,व्यापार बढ़ेगा,जीवन स्तर उंचा उठेगा आदि आदि।जिस दूरगामी सोच के साथ आपको कुर्सी पर बिठाया गया है उसका तो कोई अर्थ की नहीं क्यूंकि वह सोच तो महज स्वार्थपूर्ति तक सीमित होकर रह गई है।यह अलग बात है कि सारे रिश्ते नाते संबंध  अच्छे होने के बाद भी अप्रत्यक्ष अदायगी का फर्ज निभाना पड़ता है।भले ही यहां की यह रीत बन गई हो पर अपनों को नजरअंदाज कर अपना राजनैतिक भविष्य सुनिश्चित करने का ख्वाब क्षणभंगुर ही दिखता है।


गुस्ताखी माफ पर याद दिलाना आवश्यक है आपके सामने चुनौती है खुड़ियावासियों के विकास की।सौ किलोमीटर दूर बैठकर,केन्द्र में योजनांए बनाकर,पांच साल में एकाध दौरा कर यदि इन सबका विकास होता तो अब तक यहां के लोग निश्चित रूप से राष्ट्रपति भवन तक पंहुच चुके होते।महोदय माईक में भाषण देना,बड़े बड़े वादे करना आसान हो सकता है पर लोगों के विश्वास में खरा उतरना काफी मुश्किल है।खुड़िया साम्राज्य तो महज लेखक की कोरी कल्पना है यह अलग बात है कि जागृत आत्मांए खुड़िया क्षेत्र बगीचा के विकास के लिए बगीचा को जिला बनाए जाने की ओर संघर्ष करती नजर आ जांए।

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1 Comments

patravarta.com said…
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