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खबर खास :- जशपुर "दुष्कर्म" "जुर्माना" फिर "मटनपार्टी" मामले में क्या सच..क्या झूठ .? देखें विडियो

  • योगेश थवाईत 
जशपुर(पत्रवार्ता.कॉम) राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में बहुचर्चित "जशपुर" का रेमने गांव जहाँ कथित "दुष्कर्म" "जुर्माना" उसके बाद "मटनपार्टी" के मुद्दे पर क्या सच क्या झूठ .? इसके लिए आपको समझना होगा "जातभीतर" और "भातभीतर" 


पहले समझिये मुद्दे को 
दरअसल मामले की संक्षिप्त कहानी ये है कि जशपुर के मनोरा विकासखंड में सोन्क्यारी चौकी इलाके में  एक बालिग़ व तीन नाबालिग लड़कियां गाँव के सुरेश भगत के घर में पिछले माह टीवी देखने गई हुई थी जहाँ उनके दोस्त भी आये हुए थे और वे सभी रेमने गांव के आंगनबाड़ी के पास बैठकर बात कर रहे थे।इस दौरान बालिकाओं के परिजन आ गए और पूछने लगे कि इतनी रात यहाँ क्या कर रहे हो ...इतने में वे सभी डर कर अलग अलग दिशाओ में भाग गए।लड़के तो अपने घर आ गये पर बालिकाएं डर से तीसरे  दिन  घर लौटीं।गाँव में बैठक बुलाई गई जिसमे युवक युवतियों समेत  उनके परिजनों को बुलाया गया,अन्य ग्रामीण भी इकट्ठे हुए और मामले में युवक युवतियों को भविष्य में न मिलने रात में न घुमने की समझाइश देते हुए युवकों के परिवार वालों पर 10-10 हजार का जुर्माना लगाया गया। मामला वहीँ रफा दफा नहीं हुआ अब शुरू हुआ "भातभीतर का खेल"

जनजातीय परंपरा का हवाला 
अपनी परंपरा और रीति रिवाज के अनुसार ग्रामीण इलाकों में,आदिवासी,वनवासी,उरांव समाज के लोग आज भी बड़े से बड़े मामले को इसी "जातभीतर" और "भातभीतर" के माध्यम से निपटा लेते हैं ..यहाँ भी इस मामले में यही हुआ बस फर्क इतना था की यदि लड़का लड़की के परिवार वालों के बीच आपसी रजामंदी हो जाती और दोनों को एक सूत्र में बंधने का मौका मिलता तो "जातभीतर" की प्रक्रिया की जाती और ससम्मान समाज उन्हें अपना लेता
यादव समाज के थे युवक 
चूँकि लड़के व लड़की अलग अलग समुदाय से थे  और कुछ युवक शादी शुदा भी थे जिनसे दोस्ती तालमेल रखना भी सामाजिक दृष्टिकोण से गलत था लिहाजा यहाँ युवक के परिवार वालों पर 10-10 हजार का जुर्माना लगाया गया और तीस हजार रुपये समाज में जमा किया गया।अब बारी थी युवतियों की ..चुकी तीन दिन तक युवतियां बाहर थी लिहाजा उन्हें अशुद्ध मानते हुए "भातभीतर"की प्रक्रिया की गई जिसमे उरांव समाज और लोहरा समाज दोनों को जुर्माने की राशि में से 4-4 हजार की राशि दी गई जिससे मटन की व्यवस्था कर पुरे गांव में दावत परोसी गई,जिसके बाद दोनों समाज के लोगों ने युवतियों को अपने अपने समाज में फिर से स्थान दे दिया,और मामला रफा दफा ,बस पूरी हो गई "भातभीतर" की प्रक्रिया
"सामाजिक कोष में जो पैसे बचे उसे 485 रुपये
 के हिसाब से सभी ग्रामीणों में बाँट दिया गया
 उक्त मामले में पुलिस की जाँच में उनको दिए गए 
बयान में दुष्कर्म जैसी घटना से सभी ने इनकार किया है ।"

अब आपको बता दें कि ग्रामीण परिवेश में वनवासी आदिवासी समाज में यदि कोई भी युवती किसी दुसरे समाज के युवक के साथ दिख जाए या कोई अवैध सम्बन्ध,प्रेम सम्बन्ध सामने आ जाये तो समाज उसे अछूत मानता है और यहाँ तक की उसके परिवार वालों के साथ भी समाज का उठाना बैठना बंद हो जाता है या यूँ कहें कि समाज उसे अपने समाज से बहिष्कृत कर देता है

यहाँ अब मामले को आप समझ गए होंगे इसी बहिष्कार के डर से पुरे समाज को मटन परोसा गया और दावत खिलाई गई।मामले में जिले के पुलिस अधीक्षक ने महिला पुलिस टीम को जाँच का जिम्मा सौपा और मामले की तस्दीक कराई जिसमे उक्त मामले में दुष्कर्म की घटना से सभी ने इनकार किया है वहीँ युवक युवतियों के बीच हुए उक्त घटना पर सामाजिक समझौता व् जुर्माना की बात सच साबित हुई है

बहरहाल रीति,रिवाज,परंपरा का अपना अलग महत्त्व है जिसे देशकाल और परिस्थिति के अनुसार निभाया जाता रहा है ....यह जरुरी नहीं की हर परिस्थिति में पुरातन परंपरा रीति रिवाज सही हों ..

उक्त मामले में पत्रवार्ता की पूरी टीम का एक सवाल आपके लिए ...?

"न्याय"की पुष्ट प्रणाली को विफल करते हुए सभ्य,शिक्षित समाज में वनवासियों की इस न्याय प्रणाली को आप सही मानते हैं या गलत...?  


"गाँव में तस्दीक करने पर जो बातें सामने आई है उसमें दुष्कर्म की कोई घटना नहीं हुई है,ग्रामीणों क बयान के अनुसार युवकों के साथ युवतियों को देखा गया था जिसे लेकर गाँव में बैठक हुई और युवकों के परिवार वालों पर सभा ने 10-10 हजार का जुर्माना लगाया और भविष्य में ऐसी हरकत दुबारा न करने की नसीहत दी है,मामला संवेदनशील है हर पहलु पर गंभीरता से जांच की जा रही है...
 "पद्मश्री तंवर,एसडीओपी,बगीचा"

"क्या है "जात भीतर और भात भीतर" जानने के लिए बने रहें पत्रवार्ता के साथ "
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