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छत्तीसगढ़ में BJP क्यों हारी..? इसका जवाब मिला "जशपुर"के "धुस्का"दुकान में,आप जानकर दंग रह जाएंगे"जवाब"


क्यों खफा हो गए तुम....

जशपुर धुसके की दुकान से लाईव(टीम पत्रवार्ता) लोकतंत्र के महासंग्राम में आखिर जनता भाजपा से क्यों खफा हो गई..सब भाजपा की हार का कारण मुझसे पूछ रहे हैं। क्या प्रतिक्रिया दूँ सोचता रहा।

लोग सोचते हैं कि भाजपा नेता,पदाधिकारियों का घमंड, सोसल मीडिया पर अपनो को चैलेंज इस हार का कारण है,लेकिन मैं सिर्फ इसे पर्याप्त कारण नहीं मानता। मैं जानता था इसका जवाब धुसके की दुकान में ही मिल सकता था। 

बारिश की हल्की बूंदों के साथ गुलाबी ठंड आज मौसम भी था और तकाजा भी तो फिर मैं निकल पड़ा जशपुर के सोगड़ा मोड़ जहां स्थित लाल मिर्च की तीखी आंख डबडबा देने वाली चटनी के साथ धुस्का खाने वालों से बेहतर एकाग्रता व जवाब कहीं मिल ही नहीं सकता।

कसम बालाजी भगवान की। भाजपा के हार का कारण लोगों ने जिस अंदाज में बताया, मैं अचंभित हूँ। साझा करने से रोक नहीं पा रहा हूँ।दरअसल भाजपा की योजनाएं ही भाजपा को ले डूबी।

शौचालय
रमन चावल भरपेट सरकार ने खिलाये और मुफ्त शौचालय की घोषणा कर दी। यहां तक ठीक था। मामला तब गड़बड़ाया जब शौचालय बने नहीं,जशपुर समेत प्रदेश के कई जिलों को ओडीएफ घोषित कर दिया गया और खुले में शौच जाने वालों के पीछे सरकार डंडा लेकर पड़ गई।

कई बार तो ऐसा लगा कि खुले में शौच जाना मतलब देश द्रोह से बड़ा अपराध हो गया। अब जनता प्रेसर में भड़ास निकालने जाए तो जाए कहाँ, सो भाजपा पर ही पूरा भड़ास निकाल दिया। 

कुछ लोग भड़ास निकालना भी नहीं चाह रहे थे, लेकिन घर घर से मतदाताओं को ईवीएम तक लाने सबने जैसे- प्रण -ले लिया था। यह योजना बड़ी घातक सिद्ध हुई। कर्मचारी इतना व्यस्त हो गए कि दूसरी योजनाओं के क्रियान्वयन और गुणवत्ता को दफन कर दिया गया।

क्षुब्ध हैं कर्मचारी
हाल के दो तीन सालों में कर्मचारियों की स्थिति किसी कर्मचारी से पूछें, आपको सारे चुनाव का परिणाम मिल जाएगा। एक जमाना था कि 5 बजे कार्यालय बन्द हो जाते थे। इन वर्षों में किसी ने कार्यालय बन्द होते ही नहीं देखा।इस दौरान कर्मचारियों ने घर से अधिक कार्यालयों के शौचालय का अधिक उपयोग किया।

रविवार की छुट्टी क्या होती है ये भी लोग भूल गए। मैं कन्फर्म नहीं हूं लेकिन फ्रस्टेशन, दबाव, प्रशासनिक व्यवहार में बड़ी संख्या में लोगों ने जॉब छोड़ दिया। इन कर्मचारियों की नाराजगी भी बतौर भड़ास भाजपा पर निकली।

राशन कार्ड
अगर आपको याद होगा तो 2013 के पिछले चुनाव में चुनाव से ठीक पहले शासन ने राशन कार्ड बनवाया और चुनाव खत्म होते ही लाखों लोगों के राशन कार्ड को रद्द कर दिया गया। जनता ठगी रह गई । डॉ साहब जी इस घटना को भूल गए। लेकिन जनता को यह घटना याद थी।

खासकर उस जनता को जो आज भी एक टाइम भोजन करके गुजारा करती हैं। एक बड़ी विडंबना यह है की गरीबी रेखा का लाभ देने के लिए यह नहीं देखा जाता कि उसकी वर्तमान स्थिति क्या है, वह कितना गरीब है। बल्कि यह देखा जाता है की वह 10 साल पहले गरीब था या नहीं। आज भी पतराटोली की सेवामती बाई कई कई दिन तक भूखी रहती है। मुझे पूरा यकीन है। भाजपा को उसकी हाय लगी है।

कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में इस पॉइंट को पकड़ा और हर परिवार को चावल देने की घोषणा कर दी। इसका आइडिया कांग्रेस ने जनदर्शन से लिया, जहां हर मंगलवार को 100 से अधिक महिलाएं चावल योजना का लाभ दिलाने के लिए मांग करने आती थी और निराश लौटती थी।

स्मार्ट कार्ड
स्वास्थ्य योजना, स्मार्ट कार्ड योजना को बढा चढ़ा कर दिखाया गया। इस योजना की एक ही बात मुझे समझ में आई यदि कोई बीमार पड़ता है तो पहले जिला चिकित्सालय में जो निशुल्क मरीजों को भर्ती किया जाता था, अब इस स्मार्ट कार्ड से किया जाने लगा। इसके लिए भी कठिन प्रक्रिया और अतिरिक्त परेशानी का दौर गुजरा।

लेकिन किसी गंभीर बीमारी में या जशपुर से बाहर रेफर करने पर स्मार्ट कार्ड की बदौलत किसी का इलाज नहीं होता यह जगजाहिर है। निजी अस्पताल स्मार्ट कार्ड देखते ही मुंह फेर लेते हैं। खासकर जशपुर जिले के मरीज झारखंड जाते हैं, तो उन्हें इस कार्ड से कोई लाभ नहीं मिलता। गंभीर बीमारियों में कुछ विरले लोग ही हैं जो राजनैतिक सोर्स या मीडिया के सहयोग से इस बीमारी का लाभ उठा सकें।

रायपुर के अस्पताल में पहाड़ी कोरवा को बंधक बनाने कोतबा की मासूम बच्ची की मौत एक बड़ा उदाहरण है.. इलाज के अभाव में और खासकर पैसों की कमी के कारण इलाज के अभाव में हुई मौत की संख्या दर्जनों में आपको मिल जाएगी। पैसों के अभाव में मरीज का दर्द और परिजनों की मौत का दर्द भी ईवीएम में भड़ास की तरह निकला।

ऐसे पीड़ितों के एक भाजपा समर्थित समूह ने तो भाजपा को हराने की जिद ठान ली। यह योजना न होती तो मतदाताओं की अपेक्षा भी नहीं होती। यह योजना सरकार के लिए घातक सिद्द हुई। संजीवनी जैसी सेवाओं की हकीकत जनता से बेहतर कोई नहीं जानता।

मोबाईल, पीएम आवास
मोबाइल और पीएम आवास भाजपा को हराने में सबसे बड़े कारणों में से एक है। एक युवक का कहना था की मोबाइल ने उसकी सोच बदल दी जब वह इंटरनेट की दुनिया में आया तब उसे राजनीतिक दलों की सच्चाई समझ में आई । इंटरनेट के माध्यम से यूट्यूब में गया और कन्हैया कुमार का फैन हो गया उस दिन से वह भाजपा के विरोध में काम करना शुरू कर दिया।

सरकार मोबाइल और पीएम आवास देने की अपेक्षा मोबाइल खरीदने और पीएम आवास बनाने के लिए युवाओं को सक्षम बनाने का प्रयास करती तो बेहतर कदम होता। जिन्हें मोबाइल और पीएम आवास मिला भाजपाई हो गए। जिन्हें नहीं मिला ,उन्होंने ठान लिया कि भाजपा को हराना है। वहीं कई लोगों को स्वीकृति के बाद भी मोबाइल नहीं मिला ना ही पीएम आवास बने।


(साभार- वरिष्ठ पत्रकार विश्वबंधु शर्मा के फेसबुक वॉल के साथ योगेश थवाईत,जशपुर)

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