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रंगकर्मी प्रितेश के संघर्ष का सच

70 वें विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च पर विशेष
रायपुर/जशपुर(पत्रवार्ता डॉट कॉम) छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जन्मे युवा रंगकर्मी  प्रितेश पाण्डेय ने अपनी रंगयात्रा की शुरुवात इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से डॉ योगेंद्र चौबे जी के मार्गदर्शन में शुरू की।

अपनी शुरवाती दिनों में स्कूल में ड्रामा करते हुए जब वो खैरागढ़ के डिपार्टमेंट ऑफ थिएटर में पहुँचे तब मधुशाला,बाबा पाखंडी, बड़े भाई साहब, मासूम सपना, मनी मनी कांड,उजबक राजा तीन डकैत, होली की छुट्टी, अंधेर नगरी जैसे नाटकों में अभिनय व नेपथ्य में काम किया फिर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के परफोर्मिंग आर्ट डिपार्टमेंट में डॉ सतीश पावड़े के निर्देशन में मृक्षकटिकम, मुलैटो जैसे नाटको में मुख्य भूमिका निभाई। कहाँ गए गांधी, बकरी जैसे अनेक नाटकों में जीवंतता लाई तथा स्वदेश दीपक के कोर्ट मार्शल नाटक का निर्देशन किया जिसकी प्रस्तुति रायपुर तथा अन्य जगहों पर भी की।

प्रितेश को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की तरफ से अवार्ड ऑफ द स्कोलरशिप फ़ॉर यंग आर्टिस्ट का भी खिताब मिला। डी पी एस छिंदवाड़ा में इन्होंने रंगमंच की शिक्षा भी दी और अंधेर नगरी नाटक का बच्चों के द्वारा विभास उपाध्याय जी के सहयोग से कठपुतली स्वरूप भी दिया।

देश के कई महानगरों में गुड़ी रायगढ़ के दल के साथ अनेक नाटकों का प्रस्तुतिकरण किया। प्रितेश के द्वारा जशपुर के किनकेल गांव के बच्चों को ले कर बनाई फ़िल्म अभ्रक को रायपुर इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में बेस्ट शार्ट फ़िल्म का अवार्ड भी मिला तथा शार्ट फ़िल्म सावरी का प्रदर्शन नॅशनल स्टूडेंट फ़िल्म फेस्टिवल मुम्बई में 24 मार्च को हुआ। दानिश इक़बाल द्वारा निर्देशित फिल्म साधो जिसको भारत तथा भारत के बाहर भी कई इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में जगह मिली जिसके  लाइन प्रोड्यूसर प्रितेश पाण्डेय थे। 

प्रितेश का मानना है कि अभिव्यक्ति का कलात्मक माध्यम रंगमंच और फ़िल्म है छत्तीसगढ़ के युवा रंगकर्मी प्रितेश निरंतर रंगमंच और फ़िल्म की दुनिया मे अपना परचम लहरा रहे है और छत्तीसगढ़ को अपनी कला के माध्यम से नई दिशा दे रहे हैं। वर्तमान में प्रितेश रंगमंच के शोधार्थी भी हैं।

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